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शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

भारतीय स्वास्थ्य चिंतन पर कार्यशाला सम्पन्न

पिछले  २५ अक्टूबर को चंडीगढ़ में  भारतीय स्वास्थ्य चिंतन के राष्ट्रीय संयोजक डॉक्टर अशोक पुरुषोत्तम काले  के सद्प्रयासों से एक कार्यशाला संपन्न हुई . सुखद बात यह रही कि इसमें आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के निष्णात विद्वानों ने न केवल भाग  लिया बल्कि आयुर्वेद के उपेक्षित पक्षों पर व्यावहारिक प्रकाश भी डाला. दिल्ली स्थित पुष्पावती सिंघानिया शोध संस्थान  के प्रशासनिक निदेशक  डॉक्टर दीपक शुक्ल  ने अध्यात्मिक स्वास्थ्य पर प्रकाश डालते हुए आध्यात्मिक ऊर्जा को अमूर्त, सर्व-श्रेष्ठ एवं  चिकित्सा में उपचार का एक आवश्यक साधन बताते हुए कहा कि आध्यात्मिक ऊर्जा से मस्तिष्क का एक भाग - "प्री सेंटर गाइरस" प्रकाशित होता है. 
डॉक्टर आर. एन . महरोत्रा नें  देह व् मानस प्रकृति की निदानोपचार में  व्यावहारिक उपादेयता को महत्व देते हुए चिकित्सा में प्रकृति निर्धारण को अपनाए जाने पर बल दिया. 
आयुर्वेद विश्वविद्यालय जामनगर से आये वैद्य हितेश जानी नें गाय व् ग्राम्याधारित स्वास्थ्य नीति बनाए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए गाय  को सुख-समृधि का क्रांतिकारी स्रोत निरूपित किया. उन्होंने बताया कि बुद्धिवर्धक तत्व सेरिब्रोसाइड  एवं कैंसर विरोधी तत्व सी. एल. ए. केवल भारतीय देशी गायों के दूध में ही पाया जाता है . गाय के दूध में पाया जाने वाला पीलापन कैरोटिन की उपस्थिति के कारण होता है  जोकि  गाय में पायी जाने वाली सूर्य-केतु नाडी के प्रभाव से उत्पन्न होता है. भारतीय देशी गायों के विशिष्ट महत्व के कारण ही ब्राजील एवं न्यूजीलैंड में भारतीय देशी सांडों से गायों की नयी प्रजातियाँ उत्पन्न की जा रहीं हैं एवं उनसे क्रांतिकारी परिवर्तन लाये जा रहे हैं. जामनगर में किये गए प्रयोगों से पता चला है कि राग ललित, विभाष, भैरवी एवं आसावरी  से गाय में उत्पन्न होने वाले प्रभावों से उनके दूध में चमत्कारी गुण उत्पन्न होते हैं . गुजरात में किये गए इन प्रयोगों से बृज की गायों और कृष्ण की बांसुरी  के सुरों के बीच संबंधों की पुष्टि होती है . 
वस्तुतः गाय और गाँव के अर्थ-शास्त्र को पुनः स्थापित किये बिना भारत को सुखी व् समृद्धिशाली बनाया जा सकना संभव नहीं है. 

2 टिप्‍पणियां:

ZEAL ने कहा…

अद्भुत जानकारी !--आभार

Kaushalendra ने कहा…

डॉक्टर दिव्या जी !
द एनसिएंट साइंस ऑफ़ लाइफ को सपोर्ट करने के लिए धन्यवाद !
पारस्परिक विचार-विमर्श से कदाचित हम कुछ शुभ कर सकें जो जन कल्याणकारी हो /