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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

संत परम्परा

तुम तो ठहरे बाबा-बैरागी, तुम्हें सांसारिकता से क्या प्रयोजन? जाओ, माला जपो और ईश्वर का ध्यान करो। अन्याय,शोषण और अत्याचार से तुम्हें क्या?
........ सत्ता ने सत्य को घुड़की दी।
 ...जैसे कि ईश्वर का ध्यान केवल बैरागी को ही करना है, अन्य किसी को नहीं।
....और यह भी कि बैरागी को संसार के सामूहिक कष्टों से कभी कोई प्रयोजन नहीं होना चाहिये।

निरंकुश सत्ताओं के इस युग में एक प्रश्न विचारणीय है कि तब अन्याय, शोषण और अत्याचार के उन्मूलन का प्रयोजन यदि संत को नहीं तो और किसे होना चाहिये? क्या असंत के कुकृत्यों का विरोध किसी असंत ने किया है कभी?

क्या संतों के कर्तव्य असंतों द्वारा निर्धारित किय जायेंगे अब? क्या संत के कर्तव्यों की असंतों द्वारा खींची गयी सीमा रेखा असंतों की निरंकुश भावना का प्रमाण नहीं? मनुष्य पर मनुष्य का अत्याचार करते रहने की यह कैसी अदम्य लालसा है मनुष्य की? न केवल मनुष्य अपितु.....प्राणिमात्र ...प्रकृतिमात्र पर अत्याचार करते रहने की अदम्य लालसा है यह।

हमें परिभाषाओं पर चढ़ी धूल झाड़कर उनका परिमार्जन करना होगा, वैराग्य को एक बार पुनः समझना होगा।

कष्टों के अन्धकूप में पड़े लोगों से पूछता हूँ मैं, राग से वैराग्य तक की कठिन साधना के पश्चात....पोखर से समुद्र तक की यात्रा के पश्चात ....क्या किसी विरागी को संवेदनहीन हो जाना चाहिये? सृष्टिकर्ता की आराधना की उस स्थिति में पहुँचकर क्या संवेदनहीन हुआ जा सकता है?

संवेदनहीन तो वह है जो एकांगी राग के पंक में आकंठ डूबा हुआ है....
......यह राग एकांगी और मोहावृत है, व्यापक और विशिष्ट नहीं। विशिष्ट राग तो किसी वैरागी का ही विषय हो सकता है।
मोहावृत राग के पंक से निकलकर करुणा और प्रेम के विशिष्ट राग की यात्रा तो कोई वैरागी ही कर सकेगा...और उसी वैरागी के लिये इतनी लांछना कि समष्टि से प्रेम न करे! समष्टि की पीड़ा से पीड़ित न हो ....निर्विकार बना रहे... नेत्र मूँद ले अपने पीड़ितों को देखकर ..... कान बन्द कर ले अपने धरती की चीत्कार सुनकर!   

नहीं....परिभाषाओं को अपने स्वर्थ के साँचे में ढ़ालकर विकृत करने की स्वतंत्रता किसी को नहीं दी जा सकती।
संत तो व्यष्टिगत प्रेम के छुद्र पोखर से निकलकर समष्टिगत प्रेम के महासमुद्र की ओर यात्रा करता है।
लोग कहते हैं कि प्रेम तो सांसारिकों का विषय है, संतों का नहीं। मैं कहता हूँ कि प्रेम जब व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर व्यापक हो जाता है तब वह संत का विषय हो जाता है।
प्रेम को सतही समझना भूल होगी, वह समाप्त नहीं होता कभी .....विस्तृत होता है ...व्याप्त होता है।

वैरागी व्यक्ति अन्य सांसारिकों की अपेक्षा अधिक प्रेमी होता है....करुणा और संवेदना से भरा हुआ। उसका प्रेम विशिष्ट प्रेम है ..इसलिये वह विरागी है अरागी नहीं।
उसका राग सृष्टि मात्र के प्रति करुणा से भरा हुआ है तब वह जीवमात्र के कष्टों से निस्पृह कैसे रह सकता है भला?

भारत के विभिन्न संतों ने प्राणिमात्र के प्रेम में विह्वल होकर अपने-अपने तरीकों से सत्यम-शिवम-सुन्दरम की आराधना करते हुये जगत के कल्याण के लिये वैचारिक क्रांतियाँ की हैं। जो क्रांतिकारी नहीं वह संत कैसा?...हमें क्रांति की इस संत परम्परा को आगे बढ़ाना ही होगा।
हरि ओम तत्सत!