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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

कला और जीवन

भारतीय चिंतकों एवं मनीषियों का मत रहा है कि धर्म-मूलक राजनीति ही राष्ट्र का कल्याण कर सकती है. राजनीति पर धर्म के अंकुश की बात आज अवांछनीय स्वीकार कर ली गयी है इसलिए वर्त्तमान में धर्म और राजनीति को पृथक कर दिया गया है ....परिणाम सबके सामने है. इसी तरह विक्टर कजिन नें जीवन से कला को पृथक करने की वकालत करके न तो कला का कुछ भला किया और न ही मानव समाज का. वर्त्तमान दौर प्रज्ञापराध ( Intellectual blasphemy )का चल रहा है. ज़ो हित में अहित और अहित में हित को देखता व स्थापित करता है .....वह प्रज्ञापराधी है ... कालान्तर में तदैव सिद्धांत भी बन जाते हैं. ऐसे विकृत सिद्धांतों का खंडन कर प्राकृतिक सिद्धांतों की पुनर्स्थापना कर पाना बड़ा ही दुष्कर कार्य है ......तथापि हम इस विषय पर चिंतन तो कर ही सकते हैं. यह लेख इसी चिंतन का एक लघु प्रयास है.
सरकस के नटों के लिए कला का ज़ो अर्थ है वह रंगमंच के पात्रों के लिए नहीं है. कला का जानकार तो ठग भी होता है, प्राचीन काल में काशी की चौर्य कला प्रसिद्ध रही है. जासूस भी अपनी कला के बल पर ही रहस्यों का पता लगा पाता है, किन्तु किसी साहित्यकार या चित्रकार के लिए कला का अर्थ नितांत भिन्न है. सच तो यह है कि अपने विभिन्न रूपों में कला हमारे चारो ओर बिखरी हुयी है. अस्तु, मेरा अनुरोध है कि "कला " को परिमित न किया जाय अन्यथा कला के विस्तृत आयामों-स्वरूपों को समझाने में कठिनाई होगी और भ्रम भी. मैं गीत-संगीत, नृत्य-अभिनय, चित्रों-रंगों से आगे की कला की बात कर रहा हूँ. यह कला "आदि" की है ...."सृष्टि" की है. अमूर्त की अभिव्यक्ति है यह "कला". सृष्टि के आदि में जब सूक्ष्म सत्ता या अव्यक्त शक्ति नें अपने आप को भाव जगत में व्यक्त किया तब वह भी कला ही थी........ईश्वर की कला. इस कला नें अपने मूर्त स्वरूप से सभी को मोहित किया, इसीलिये विद्वानों नें इसे नाम दिया -"माया". इस "माया" का चितेरा ईश्वर है इसलिए उसकी सम्पूर्ण कला "विचित्र" है. मनुष्य द्वारा रचित कला "चित्र" है, विचित्र नहीं. इसका तो वह अधिकारी ही नहीं है ...और न ही इतना सामर्थ्यवान. कविता, कहानी, उपन्यास इन सब में लिखे गए शब्द हमारे मन मस्तिष्क में चित्र ही तो बनाते हैं.
जिस प्रकार "अमूर्त विचार" मूर्त भाव में प्रकट होकर कला बन जाते हैं उसी तरह "अव्यक्त शक्ति" व्यक्त भाव में प्रकट होकर ब्रह्माण्ड बन जाती है. दूसरे शब्दों में कहें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वर रचित कला ही तो है. आयुर्वेद नें माना है कि मनुष्य का सूक्ष्म शरीर ही प्रकट होकर स्थूल के रूप में जीवन को धारण करता है. आशय यह कि जीवन भी एक कला है. दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन को कलापूर्ण ढंग से जिया जाना चाहिए. आयुर्वेद नें विश्व को यही तो सिखाया है. गर्भाधान के संकल्प से लेकर जातक के जन्म और मृत्यु तक के सभी प् दा वों   को सुरुचिपूर्ण ढंग से जीना ही "जीवन की कला" है. आवश्यकता तो यह है कि विश्व समाज इस दुर्लभ कला को सीखकर अपने जीवन को चित्रित कर रंजित करले और वर्त्तमान जीवन शैली के दुष्परिणामों से स्वयं की रक्षा करे. आगे के लेखों में हम आयुर्वेद की इस दुर्लभ कला के दर्शन करेंगे. अभी तो ईश्वर की अनंत कला का दर्शन ही अभीष्ट है जहां ब्रह्माण्ड के सभी पिंड एक वृहत व्यवस्था के अंतर्गत गति करते हुए हमें न केवल आश्चर्यचकित करते हैं अपितु हमारे जीवन को प्रभावित भी करते हैं. यही कला रात को आकाश में टिमटिमाकर बच्चों को कौतूहल से भर देती है, तब उनके बाल-सुलभ मन में उत्पन्न हुए प्रश्नों के उत्तर दे सकना किसी कलाकार के ही वश की बात होती है. ईश्वर की यही परम कला जब धरती पर उतरती है तो कहीं पर्वत, कहीं घाटियाँ, कहीं झरने, कहीं हिम, कहीं जंगल, कहीं पुष्प .........न जाने किन-किन रूपों में प्रकट होकर पूरी धरती पर बिखर जाती है. क्या इस कला नें कभी हमें अपनी चुम्बकीय एवं मायावी शक्ति से अपनी ओर आकर्षित नहीं किया है ? क्या इस कला नें हमारे श्रांत-क्लांत तन-मन को कभी नव स्फूर्ति, शक्ति, उत्साह, सुख व शान्ति से भर नहीं दिया है ? क्या इस कला नें किसी दिव्य औषधि की तरह कभी हमारी उदासी और खिन्नता को दूर कर हमें प्रसन्नता का स्वास्थ्य लाभ नहीं दिया है ? इस अद्भुत कला से वंचित रहकर ही हम अपने दुर्भाग्य को स्वयं आमंत्रित करते हैं. आधुनिक भौतिक जीवन-शैली नें हमें प्रकृति की इस अमूल्य कला से दूर कर दिया है जिसके कारण हम नाना शारीरिक-मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हो दुख और हताशा का जीवन जीने के लिए बाध्य हो गए हैं. 
अभी मैंनें कला के एक पक्ष की प्रसंगवश चर्चा की है. कला का एक शरीर-क्रियात्मक पक्ष भी है. आप किंचित ध्यान देंगे तो स्पष्ट हो जायेगा कि जैसे-जैसे हम कविता पढ़ते या सुनते जाते हैं वैसे-वैसे हमारे मस्तिष्क में शब्द या ध्वनि आकार ग्रहण करती है. इसी तरह कहानी या उपन्यास पढ़ते समय भी शब्द आकार ग्रहण करते रहते हैं....अर्थात कला की स्थितिज ऊर्जा मस्तिष्क में अपने गतिज स्वरूप में प्रकट होती रहती है. इस प्रकार की कला ज़ो मस्तिष्क को अधिक क्रियाशील बनाती है ...एक्टिव आर्ट है. इसके विपरीत चल-चित्र जगत की कला मस्तिष्क को किंचित उद्वेलित या रंजित भर ही कर पाती है ...अर्थात यह मस्तिष्क को अधिक  रचना-क्रियाशील  नहीं बनाती ....इसे हम पास्सिव-आर्ट की संज्ञा दे सकते हैं.
कला के लिए मैं जानबूझकर Active एवं Passive शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ और इस धृष्टता  के लिए सभी से क्षमाप्रार्थी भी. यदि मैं सक्रिय एवं निष्क्रिय शब्दों का प्रयोग करता तो किंचित कोई झमेला खड़ा हो सकता था कि कला भी कहीं निष्क्रिय होती है भला ! किन्तु सचमुच, विचार करने की बात है ....क्या आज  हम कला को निष्क्रिय नहीं बनाते चले जा रहे? 
"कला" वस्तुतः अमूर्त विचारों की मात्र मोहक अभिव्यक्ति ही नहीं अपितु वह सोद्देश्य बौद्धिक परिणति भी है. यही तो वे तत्व हैं ज़ो कला को एक्टिव एवं चिर बनाते हैं. जिस कला में इन दोनों तत्वों का अभाव होगा वह कला क्षणिक रंजक एवं पास्सिव मात्र होगी. दूर-दर्शन आदि के कार्यक्रम सूचनात्मक, रंजक एवं कभी-कभी विकृत भी होते हैं .....इनमें प्रदर्शित कला मन-मस्तिष्क को प्रखर नहीं बनाती. दृश्य हमारी दृष्टि के सामने होते हैं. शब्दों या ध्वनि से मन में प्रतिक्रिया हो कर दृश्य रचना जैसी कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं हो पाती. अर्थात सब कुछ "तैयार" रहता है. यह ठीक गणित और इतिहास पढ़ाने जैसा है. गणित हमारे मस्तिष्क को Active बनाता है जबकि इतिहास के मामले में मस्तिष्क "Passive" रहता है. मस्तिष्क में घटने वाली Passive घटना का स्पष्ट परिणाम यह होता है कि हमारा मन-मस्तिष्क कल्पनाशील और प्रखर नहीं बन पाता. इसीलिये मैंने कला को Active  और Passive -इन दो वर्गों में बाटने का दुस्साहस किया है.
मस्तिष्क में कला की रचना-यात्रा विचारों-भावनाओं से कला की ओर एवं पुनः कला से विचारों-भावनाओं की दिशा में होती है. कला की शक्ति का यह स्थितिज एवं गतिज स्वरूप है. विचार और भावनाएं जब तक मन में हैं ...वे अमूर्त रहते हैं ....जब प्रकट होते हैं तो कला बन जाते हैं. यह प्रक्रिया तो कलाकार तक ही सीमित रहती है, किन्तु कलाकार के अतिरिक्त अन्य लोगों के मन में भी कला अपनी प्रतिक्रियाओं से पुनः विचार एवं भाव उत्पन्न करती है. अतः इस रूप में कला उत्प्रेरक भी है...अर्थात कला लोगों के लिए उत्प्रेरण का कार्य कर उनके मन में नवीन विचारों-भावों की सृष्टि करती है. दूसरे शब्दों में अमूर्त से मूर्त एवं पुनः मूर्त से अमूर्त की ओर कला की रचना-यात्रा होती रहती है. अब यदि कला बौद्धिक एवं उद्देश्यपूर्ण भी हो तो वह निश्चित ही अपनी रचना-यात्रा में सफल होगी. 
ऐसा माना जाता है कि कला हमारे विचारों को प्रभावित करती है और विचार हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं. आज मनुष्य नें भौतिक ज्ञान में ज़ो उपलब्धियां प्राप्त की हैं उसके परिणामस्वरूप हमारे बच्चों को पाठशालाओं में "सूचनात्मक-ज्ञान" ही रटाया जा रहा है. Active art  से  दूरी के कारण यह ज्ञान उनमें सद-विचार नहीं जगा पाता. बच्चे ख़ूब सूचनाएं एकत्र करते हैं ...उन्हें रटते हैं ...फिर परीक्षा में सूचनाओं का यथाशक्ति वमन कर देते हैं. आज यह वमन ही उनकी योग्यता का माप-दंड बन गया है. इसी योग्यता के बल पर आगे चलकर वे बड़े-बड़े अधिकारी बनते हैं और आर्थिक, भौतिक, सामाजिक....चारित्रिक.......हर प्रकार के अपराधों के लिए राजाज्ञा प्राप्त कर लेते हैं. ऐसे लोग समाज, राष्ट्र और मानवता...सभी के लिए घातक होते हैं. कारण .....? कारण यह है कि वे या तो कला से दूर रहे ...या Passive कला के प्रेमी रहे जिसने उन्हें विचार नहीं दिए...भावनाएं नहीं दीं और उन्हें अच्छी दिशा में गति करने की प्रेरणा नहीं  दी. 
कुछ लोग मानते हैं कि कला तो हृदय का विषय है और ज्ञान मस्तिष्क का. मुझे इस धारणा में कुछ आपत्ति है. एक चिकित्सक होने के नाते मैं मानता हूँ कि कला के बीज मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं और हृदय की कोमलता से सिंचित हो अंकुरित...पल्लवित...एवं पुष्पित होते हैं ईश्वर नें इतनी जटिल एवं परा-वैज्ञानिक सृष्टि की रचना कर इसका प्रमाण भी हमें दे दिया है. इस प्रकार से यह हम सबके लिए एक सन्देश भी है कि कला-रहित ज्ञान मनुष्य का कल्याण नहीं ...विनाश ही करेगा. ओसामा-बिन-लादेन, परवेज़ मुशर्रफ, जार्ज बुश, सद्दाम हुसैन और एरिअल शेरोन जैसे निष्ठुर ज्ञानियों को ईश्वर की अपरिमित "सृष्टिरूपी-कला" के विभिन्न रागों से सीख लेना चाहिए. ये लोग कला और जीवन दोनों को निरंतर क्षति पहुंचाए चले जा रहे हैं. अब अपने सुखमय जीवन के लिए विवेकपूर्ण निर्णय लेने की बारी हमारी है.      

          
            

रविवार, 5 दिसंबर 2010

घर में बनाइये मोइश्चराइज़र

किसी शिशु के गोरे-गुलाबी गालों के स्पर्श की अनुभूति देने जैसी शीत ऋतु तो आ गयी.....पर इन गालों की कोमलता बनाए रखना ........सचमुच किसी समस्या से कम नहीं  है. पर प्रकृति नें अपने खजाने में इस समस्या का हल भी छिपा रखा है आपके लिए, तो चलिए खोजते हैं ...क्या है इस खजाने में. पहले एक काम करते हैं .....आप बाजार से ग्लिसरीन और गुलाब-जल ले आइये ..तब तक हम कहीं से जुगाड़ करते हैं ताजे नीबुओं का.  
.........ले आये ! चलिए, आज आप अपने शरीर की त्वचा को कोमल बनाए रखने के लिए घर में ही बनाइये एक अच्छा सा मोइश्चराइज़र, विधि हम बताये दे रहे हैं -
ग्लिसरीन -    ६० मिली ली.
गुलाब जल  -    ३० मिली ली. 
ताजे नीबुओं का रस - १० मिली ली. 
एक साफ़ कांच की शीशी में इन सबको उपरोक्त मात्रा में लेकर मिला कर रख लें ....बस ! हो गया .... मोइश्चराइज़र तैयार है आपका. जब भी आवश्यकता हो इसकी कुछ बूँदें लेकर त्वचा पर लगा लें.
ग्लिसरीन त्वचा की नमी को बनाए रखती है, गुलाब-जल त्वचा के वर्ण को निखारता है और नीबू का विटामिन सी.त्वचा को पोषण तो देता ही है ......मृत कोशिकाओं को भी शरीर से सरलता से पृथक करनें में सहयोग करता है. इतने गुण और कहाँ मिलेंगे आपको ? तो आजसे महंगे मोइश्चराइज़र खरीदना बंद.
स्वदेशी अपनाइए .....देश बचाइये ......(अउर भइया पकेटवा का पईसवा भी त बचेगा न ! ई काहे भूल रहे हैं ...)      

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

सिकलिंग -एक आनुवंशिक रोग .

सिकलिंग/सिकल सेल एनीमिया ....एक परिचय :- छत्तीसगढ़ एवं समीपवर्ती ओडीसा राज्य के कुछ जिलों में सिकलिंग एक जाना पहचाना रोग है ज़ो यहाँ की जन-जातियों के अतिरिक्त साहू,यादव, कुम्हार, सतनामी आदि जातियों में देखने को मिलता है. अभी तक यह लाइलाज है किन्तु संभव है कि आने वाले समय में जेनेटिक इंजीनियरिंग के द्वारा इसके लिए उत्तरदायी जीन को ठीक किया जा सके. लेकिन तब तक इस गंभीर रोग को नियंत्रित किये जाने के कुछ उपाय तो किये ही जा सकते हैं. बेहतर हो कि प्रभावित क्षेत्रों में सिकलिंग जीन वाले लोगों की पहचान की जाए और स्कूल-कालेजों  के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाय.
क्या है सिकलिंग ? - यह लाल रक्त कणों में पाए जाने वाले हीमोग्लोबिन की संरचनात्मक विकृति से उत्पन्न होने वाला रोग है. हीमोग्लोबिन  के निर्माण में लोहआयन- पोरफाईरिन  चेन एवं कई अमीनो एसिड्स भाग लेते हैं. सामान्य व्यक्ति के हीमोग्लोबिन में बीटा चेन के अमीनो-एसिड्स के छठवें क्रम पर  ग्ल्यूटामिक एसिड संलग्न रहता है किन्तु जीन म्यूटेशन या जेनेटिक मेटेरियल के डिलीशन से ग्ल्यूटामिक एसिड के स्थान पर "वैलीन" के कण संलग्न हो जाते हैं. बीटा चेन के १४६ अमीनो एसिड्स में से मात्र एक के स्थानापन्न से ही एक गंभीर एवं लाइलाज बीमारी उत्पन्न हो जाती है. वस्तुतः , इस  संरचनात्मक  विकृति के कारण ही हीमोग्लोबिन के कण ऑक्सीजन की कमी होने पर पॉलीमर बनाते हैं और क्रिस्टल के रूप में बदलकर रक्त-कण की मेम्ब्रेन की भीतरी सतह पर एकत्रित हो जाते हैं जिसके कारण रक्त कण का आकार विकृत होकर हंसिया की तरह हो जाता है . इस आकृति के कारण ही इस रोग का नाम सिकलिंग रखा गया है . किन्तु जिन लोगों के रक्त में सिकल सेल की संख्या ५०% तक होती है उन लोगों में रोग के लक्षण प्रायः उत्पन्न नहीं होते या बहुत कम होते हैं वह भी विशेष स्थितियों में ही .
सिकलिंग के रोगियों में मुश्किल तब शुरू होती है जब हंसिया के आकार वाली रक्त कणिकाएं अपनी आकृति के कारण छोटी-छोटी रक्त -केशिकाओं में फंस कर रह जाती हैं और आगे अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पातीं . इससे रक्त केशिकाओं में मार्गावारोध होकर शरीर के उस अंग में रक्त का प्रवाह रूक जाता है इस स्थिति को इस्कीमिया कहते हैं जिसके परिणामस्वरूप इन्फार्क्शन जैसी गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है. सिकल सेल एनीमिया के रोगियों में विभिन्न प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं, विकृति के आधार पर इन्हें चार समूहों में बाटा गया है :-
१- वैसो-ओक्ल्यूसिव क्राइसिस - यह अपने आप या किसी संक्रमण के पश्चात हो सकता है . रक्त प्रवाह में रूकावट के कारण प्रभावित अंग में  दर्द की शिकायत बनी रहती है .ऐसे शिशुओं में प्रारम्भिक लक्षण के रूप में हैण्ड-फूट सिंड्रोम मिल सकता है जिसमें हाथ-पैर में सूजन के साथ दर्द होता है . वयस्कों में हड्डियों के बड़े जोड़ों में सूजन के साथ दर्द हो सकता है . किसी-किसी को पेट में तीव्र दर्द होता है . इस्कीमिया यदि मस्तिष्क में हो तो स्ट्रोक आते हैं जिससे तुरंत मृत्यु हो सकती है या आधे शरीर का लकवा हो सकता है.फेफड़े की इस्कीमिया होने पर न्यूमोनिया जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं .
२- सीक्वेस्ट्रेशन क्राइसेस :- कभी-कभी किन्हीं कारणों से रक्त की अधिकाँश मात्रा का प्रवाह यकृत और तिल्ली की ओर हो जाता है जिससे शरीर के अन्य भागों को रक्त बहुत कम मिल पाता है , परिणामस्वरूप बड़ी तीव्रता से सर्क्युलेट्री कोलेप्स के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं.सिकलिंग पीड़ित शिशुओं में मृत्यु का यह एक बड़ा कारण है. ऐसी स्थिति में रोगी के शरीर में जल या रक्त चढ़ाकर स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है.
३- एप्लास्टिक  क्राइसिस :- इसमें रक्त निर्माण की प्रक्रिया ही फेल हो जाती है. यद्यपि यह एपीसोड १० से १४ दिन का होता है और बाद में स्वतः ही समाप्त भी हो जाता है.किन्तु कुछ रोगियों में तीव्रता से रक्ताल्पता के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं. 
४- हाइपर हीमोलिटिक क्राइसेस  :- यह स्थिति बहुत कम होती है . सिकलिंग के कुछ विशेष रोगियों में , यदि वे ऑक्सीडेंट ड्रग्स का उपयोग करते हैं या कोई संक्रमण हो जाए तो उन्हें यह क्राइसेस हो सकती है जिससे यकृत के कार्यों में अवरोध उत्पन्न  होकर जौंडिस हो सकती है . कभी-कभी तो ३ वर्ष तक के बच्चों में भी इस क्राइसिस के कारण पित्ताशय में पथरी बन जाया करती है. सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम में रक्ताल्पता से लकवा हो सकता है. किडनी में फाइब्रोसिस होकर किडनी खराब हो सकती है. 
सिकलिंग के प्रकार :- 
१- सिकल सेल ट्रेट (AS) या छोटी सिकलिंग - उन्हें होती है जिनके रक्त में माँ या पिता से प्राप्त जींस में से एक सामान्य और दूसरा असामान्य होता है . यह गंभीर तो नहीं होता पर कुछ स्थितियों में गम्भीर होकर रोगी को संकट में डाल सकते हैं . ये लोग किसी भी जीवाणु के प्रति अधिक सुग्राही होते हैं जिसके कारण बच्चों में फेफड़ों के रोग, सेप्टीसेमिया , न्यूमोकोकल मेनिन्जाईटिस,  ओस्टियोमाइलाइटिस आदि होने की संभावना  बनी रहती है.
२- दूसरे प्रकार को सिकल सेल डिसीज़ (SS) या बड़ी सिकलिंग -  कहते हैं , गंभीर स्थिति इसी के कारण उत्पन्न होती है. यदि इन्होंने जीवन में संयम  न बरता तो अल्पायु में इनकी मृत्यु भी हो सकती है. 
वंश परम्परा से होता है सिकलिंग :- भारत सहित विश्व के  अनेकों देशों में कुछ जाति-विशेष के लोगों में वंश परम्परा से यह रोग अगली पीढ़ियों में आगे बढ़ता है, अतः छोटे बच्चों में भी मिल सकता है ,फिर भी बच्चों में छः माह की उम्र के बाद ही इसके लक्षण प्रकट हो पाते हैं .
गंभीर हो सकता है सिकलिंग :-
सावधानी न बरतने पर , झोला छाप लोगों से इलाज़ कराने से एवं रक्ताल्पता अधिक बढ़ जाने से आधे शरीर का लकवा हो सकता है, या जोड़ों की सूजन अधिक समय तक बने रहने से अस्थियों के जोड़ों में विकृति हो कर लंगड़ापन हो सकता है या कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है.
सावधानी रखें दवा लेते समय :-
सिकलिंग के रोगियों को कोई अन्य रोग होने पर भी उस रोग से सम्बंधित दवाएं लेते समय सावधानी की अत्यंत आवश्यकता होती है. कुछ दवाएं ज़ो उन्हें हानि पहुंचा सकती हैं वे ये हैं - बुखार की दवाएं, सल्फोनामाइड,  मलेरिया की दवाएं,  नैफ्थाक्विनोलोन , नाइट्रओफ्यूरोंटोईन, एस्प्रिन,  आयरन के टॉनिक एवं विटामिन के. अतः अपने मन  से कभी दवाएं मत  लें. 
सिकलिंग थैलेसीमिया  और मलेरिया :-  सिकलिंग एवं थैलेसीमिया एक साथ मिल सकता है पर सिकलिंग के साथ मलेरिया प्रायः नहीं मिलता .अतः बुखार आने पर जांच कराये बिना मलेरिया की दवा मत लें . 
कैसे पहचानेंगे इसे ? 
यदि  बच्चों  के  हाथों -पैरों  में  सूजन के साथ दर्द हो, बार-बार सर्दी, खांसी, न्यूमोनिया होता हो, अंगों में पीड़ा हो, पेट में दर्द होता हो, कमजोरी लगती हो, और दवाइयां खाने पर भी लाभ न हो रहा हो रहा हो  तो सिकलिंग का संदेह कर सकते हैं. पेट में स्पर्श करने पर तिल्ली बड़ी हुई मिल सकती है . ऐसा होने पर रक्त का सिकलिंग टेस्ट कराना चाहिये . बेहतर हो कि हीमोग्लोबिन की इलेक्ट्रोफोरेटिक जांच कराई जाय .
सिकलिंग से प्रभावित होने वाले प्रमुख अंग :- अस्थियाँ, यकृत, तिल्ली, फेफड़े, मस्तिष्क और आँख.
कब प्रकट होते हैं लक्षण? 
संक्रमण होने से, ऑक्सीजन की कमी होने से, ऊंचे स्थानों में जाने से, व्यायाम अधिक करने से, शरीर में जल की कमी होने से, तेज सर्दी से , वाहनों के धुएं से, अम्लीय पदार्थों के सेवन से, गर्भावस्था में एवं प्रसव के बाद सिकलिंग (ट्रेट ) के रोगियों में रोग के लक्षण तीव्रता से प्रकट होने की संभावना रहती है.
कब कराएं जांच ?
सिकलिंग के पीड़ितों को चाहिए कि वे अपने बच्चों में नौ माह की उम्र के पहले ही हीमोग्लोबिन की इलेक्ट्रो फोरेटिक जांच करवा लें यह विश्वसनीय जांच है एवं एक बार करवा लेने के बाद बार-बार करवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. इस जांच में थैलेसीमिया का भी पता चल जाता है  ध्यान रहे रक्त का सामान्य सिकलिंग टेस्ट फाल्स निगेटिव या फाल्स पोसिटिव हो सकता है. 
सिकलिंग से बचने के उपाय :- 
१- यह एक आनुवंशिक रोग है अतः विवाह के पूर्व वर-वधु के रक्त की सिकलिंग जाच अवश्य कराएं . यदि दोनों में सिकलिंग हो तो विवाह मत कराएं. अगली पीढ़ियों में इसे रोकने का यही एक मात्र उपाय है. २- गर्भावस्था के समय संक्रमण से बचाव, कम से कम दवाओं का प्रयोग, एक्स-रे आदि परीक्षणों से यथासंभव बचाव करें तथा पौष्टिक आहार देवें, गर्भिणी का सुरक्षित प्रसव भी एक आवश्यक कदम है. 
उपचार की व्यवस्था :-
१- सिगरेट, शराब आदि नशों से परहेज़ करें २- अधिक परिश्रम से बचें,३ - संक्रमण से बचाव करें, ४ पौष्टिक एवं सुपाच्य आहार का सेवन करें, ५- लक्षणों की शान्ति हेतु धैर्य पूर्वक आयुर्वेदिक दवाओं का सेवन करें. 
सिकलिंग में लाभदायक है :- 
ख़ूब पानी पीना, मकोय, पुनर्नवा, चौलाई, डोडा शाक, मूंग दाल, सहजन, सिंघाड़ा, कमल नाल (ढेंस), कमल का बीज, दूध, मधु, रसीले तथा मीठे फल और खुले हवादार स्थानों में रहना. 
सिकलिंग में हानिकारक है:- 
तले एवं अम्लीय पदार्थ , मांसाहार, फावा-बीन, कोई भी नशा, किसी भी प्रकार का संक्रमण, वाहनों का धुंआ, ऊंचे  स्थानों पर रहना या पहाड़ों पर जाना, रेडियेशन, डिहाइड्रेशन,  एसिडोसिस एवं बिना डाक्टर की सलाह के कोई भी दवा सेवन करना.