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रविवार, 3 अक्तूबर 2010

आनंद की खोज में .....

जीवन अद्भुत है .......प्रकृति को ईश्वर का  एक अनुपम उपहार. यह विज्ञान भी है और कला भी. आप जीवन को कलात्मक विज्ञान भी कह सकते हैं.दुर्भाग्य से हमने जीवन के विज्ञान को जीवन की कला से पृथक कर दिया है, परिणाम  स्वरूप  आज हम न जाने कितनी व्याधियों से ग्रस्त होते जा रहे हैं.........शारीरिक-मानसिक व्याधियां. सभी के विशेषज्ञ अपनी विशेषज्ञता के साथ लोगों को स्वास्थ्य लाभ देने का प्रयास कर रहे हैं.पर रोग हैं कि पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं.......यह विचारणीय है. ऐसा क्यों हो रहा है ?
       कारण स्पष्ट है, हमने जीवन की सम्पूर्णता को खंडित कर दिया है. जीवन से विज्ञान को खंड-खंड कर दिया.....और फिर उसकी कलात्मकता को नष्ट कर दिया.जीवन  अब सहज-सरल नहीं  रह गया. उसका सहज प्रवाह समाप्त हो गया है .
मैं आपको एक बात बताता हूँ .हृदय के रोगों के लिए आप कार्डियोलोजिस्ट के पास  जाते हैं, मूत्र संबंधी रोगों के लिए नेफ्रोलोजिस्ट के पास जाते हैं. शरीर अपनी समग्रता के साथ कार्य करता है. जबकि दोनों विशेषज्ञ अपने-अपने तरीके से ....अपने-अपने क्षेत्र विशेष में कार्य करते हैं. दोनों ने दिल और गुर्दों को एक दूसरे से अलग करके देखने का प्रयास किया.विज्ञान  ने शरीर को खंडित कर दिया न ! तो अब चिकित्सा सम्पूर्ण कैसे हो सकेगी ? आज-कल होलिस्टिक अप्रोच   की बात की जा रही   है.यह  जीवन  को  उसकी  समग्रता  के  साथ  देखने  का  प्रयास  है . जीवन  अपने  समस्त  तत्वों  के  साथ विचारा  जाय .........पूर्ण  विज्ञान  और  पूर्ण  कला  के  साथ .
       आज कल तो हमारा जीवन यंत्रवत हो गया है.जीवन का आनंद समाप्त हो गया, जब कला ही नहीं तो आनंद कहाँ से आयेगा ? क्या यह आश्चर्य नहीं कि हम सब आनंद की खोज में ही तो दिन-रात लगे रहते हैं पर आनंद के लिए ही समय नहीं निकाल पाते ! दिन-रात काम-काम ......व्यस्तता ही व्यस्तता. और फिर प्रारम्भ होता है रोगों का सिलसिला. सच तो यह है कि रोगों का नियंत्रण सीधे हमारे ही हाथों में है. कितने लोगों को मालुम है यह ?
     आगे के आलेखों में हम जीवन के वैज्ञानिक और कलात्मक सभी पक्षों पर चिंतन करने का प्रयास करेंगे. और प्रयास करेंगे कि जीवन को कैसे निरामय और आनंदमय बनाया जाय. इस चिंतन-यात्रा में सहभागिता के लिए आप भी सादर आमंत्रित हैं. इति शुभम !     .
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